भारत में विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाले विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) में प्रस्तावित संशोधन इन दिनों चर्चा का विषय बने हुए हैं। यह बहस केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि अमेरिकी सांसदों की टिप्पणियों के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसका दायरा बढ़ गया है। सरकार का कहना है कि इन बदलावों का उद्देश्य पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है, जबकि विपक्षी दल इसे संस्थाओं की स्वायत्तता के लिए चुनौती मान रहे हैं। एफसीआरए कानून के तहत यह तय किया जाता है कि कोई गैर-सरकारी संगठन, ट्रस्ट, शैक्षणिक संस्थान, धार्मिक संगठन या व्यक्ति विदेश से प्राप्त धन का इस्तेमाल किन शर्तों के तहत कर सकता है। इस कानून का उद्देश्य विदेशी फंडिंग की निगरानी करना और यह सुनिश्चित करना है कि इसका उपयोग राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतांत्रिक व्यवस्था और सार्वजनिक हित के खिलाफ न हो। हाल ही में अमेरिका के वेस्ट वर्जीनिया से रिपब्लिकन सांसद राइली मूर ने प्रस्तावित संशोधनों पर चिंता जताई थी। उन्होंने दावा किया कि इससे भारत सरकार को चर्च और अन्य धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन में अधिक हस्तक्षेप का अधिकार मिल सकता है। वहीं, भारतीय विपक्षी नेताओं ने भी इस विधेयक के कुछ प्रावधानों पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का आरोप है कि यदि किसी संस्था का एफसीआरए लाइसेंस रद्द हो जाता है, तो सरकार को उसकी संपत्तियों पर नियंत्रण स्थापित करने का अधिकार मिल सकता है। विपक्षी नेताओं का मानना है कि इससे चर्च, स्कूल, अस्पताल और अन्य अल्पसंख्यक संस्थाएं प्रभावित हो सकती हैं। दूसरी ओर, सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि धार्मिक स्थलों की पहचान और उनकी गतिविधियों को किसी भी तरह प्रभावित नहीं किया जाएगा। सरकार के अनुसार, नए संशोधनों के तहत विदेशी धन से बनाई गई संपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक नामित प्राधिकारी की नियुक्ति की जाएगी। इसके अलावा, संस्थाओं को अपील का अधिकार भी मिलेगा और नियमों के उल्लंघन से संबंधित मामलों में सजा की अवधि को पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष करने का प्रस्ताव रखा गया है। नए नियमों के तहत अब संस्थाओं को यह स्पष्ट करना होगा कि विदेशी धन का उपयोग किस उद्देश्य और किन राज्यों में किया जाएगा। इसके अलावा, वार्षिक रिपोर्ट में परियोजनाओं और गतिविधियों से जुड़ी विस्तृत जानकारी देना भी अनिवार्य होगा। संस्थाओं को अपनी आधिकारिक वेबसाइट और सोशल मीडिया खातों का विवरण भी उपलब्ध कराना होगा। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में देश की लगभग 16,200 पंजीकृत संस्थाओं को करीब 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी अंशदान प्राप्त हुआ। मंत्रालय का कहना है कि एफसीआरए विदेशी सहायता पर प्रतिबंध लगाने का नहीं, बल्कि उसके उपयोग को नियंत्रित और पारदर्शी बनाने का कानून है। फिलहाल एफसीआरए संशोधन विधेयक संसद के विचाराधीन है, जबकि इससे जुड़े कई नए नियम पहले ही लागू किए जा चुके हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर संसद और राजनीतिक दलों के बीच बहस और तेज होने की संभावना है।